Tuesday, May 27, 2008

आगाज़

लोग अक्सर उस से पूछा करते थे कि "विजय ही क्यूं? नाम तो और भी कई हो सकते थे?" वो मुस्कुरा भर देता था और कोई घटिया सा बहाना बना के पीछा छुड़ा लिया करता था. ट्रेड सीक्रेट यूँ ही सभी को नहीं बता दिया जाता.

...

वेनेशियन ब्लाइंड्स से छनती हुई कमज़ोर, तिरछी, पीली धूप की किरणें हमारे हीरो के चेहरे पर पड़ रही थीं. उसके हाथ में अपने पसंदीदा राइटर कि लेटेस्ट किताब थी जो कल ही उसने खरीदी थी. पर इस समय उसका ध्यान किताब और उसके पेचीदा प्लॉट पर नहीं था. वो तो किसी और ही उधेढ़-बुन में लगा था.

"मैंने बहुत दुनिया देखी है", ऐसा वो अक्सर कहा करता था, और मेरी मानिये तो कुछ ग़लत नहीं कहता था. उन तमाम सवालों के जवाब, जिन्हें फिलोसफर सोचते सोचते ख़ाक हो गए, हमारे नायक के पास मौजूद थे. अपने काम के सिलसिले में उसने आदमी और उसके स्वभाव के बारे में जिस गहराई से सोचा था, वो फिलोसफरों की पहुँच के बाहर था. जिन परिस्थितियों में उसने आदमियों पर अपने सिद्धांतों की जांच की थी, वो वैज्ञानिकों के परे था.

दरवाज़े के स्पीकर से निकली आवाज़ ने उसकी सोच में विघ्न डाला. "कम इन", उसके मुंह से निकला, और दरवाज़ा खुल गया.

कमरे में एक लड़की खड़ी थी जो बड़े गौर से अपने सामने बैठे आदमी की ओर देख रही थी...

एक पल के लिए उस आदमी की आँखों में चमक आई और एक तिरछी सी मुस्कान उसके चेहरे पर फ़ैल गई. उसने अलसाये हुए तरीके से अपनी कुर्सी लड़की की तरफ़ घुमाई और बैठे बैठे अपना हाथ उसकी तरफ़ बढाते हुए बोला, "कौल मी विजय...जासूस विजय."

3 comments:

satyavrat said...

दिलचस्प.

ira said...

I think with this piece of shit you do qualify as a pulp fiction writer...congrats! Tumhari 'vijay' hui.
(:P)

Anonymous said...

wah.kahani aage baadaiye.